समझ का अँधेरा || अधिवक्ता कर्ण निकुंभ
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मैंने जीवन में एक समय ऐसा देखा, जहाँ मुझे सफलता से अधिक असफलता को समझने की जिज्ञासा हुई।
क्योंकि सफल व्यक्ति अक्सर अपनी चमक दिखाता है, लेकिन असफल व्यक्ति अनजाने में अपने जीवन का सच खोल देता है।
मैं उन लोगों से मिलने निकला जिन्हें समाज प्रतिभाशाली कहता था, लेकिन जब उनके कर्मों को देखा तो एक अलग ही सत्य सामने आया।
आलोचनाओं पर सब्र मांगती है।
जिस दिन मनुष्य कर्म से अधिक उसकी चर्चा का आनंद लेने लगे, समझ लेना चाहिए कि उसका ध्यान लक्ष्य से हट चुका है।
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